‘छठ’ सुनते ही मन में अनेक शब्द और भाव उमड़ने लगते हैं। कभी ठेकुआ(पकवान) की मिठास का स्मरण ही मन विभोर कर देता है तो कभी शारदा सिन्हा जी के गीतों को सुनकर पूरे शरीर में ‘राष्ट्रगान’ के बाद वाली सिहरन को महसूस कर पाना संभव हो जाता है। सचमुच छठ इमोशन है हम बिहारियों का। छठ लव है लव। इन सब बातों से इतर छठ की महत्ता उसकी पवित्रता से है। छठ की महत्ता उसकी अकृत्रिमता से है। मुझे याद है मैय्या (माँ) कैसे किसी भी पूजा के समान को छूने से पहले कन्फर्म होती है कि मैंने अभी हाथ धुले हैं कि नहीं। छठ पूजा से सम्बन्धित कार्य-व्यापार के मामले में स्वच्छता और शुद्धता से कोई समझौता नहीं किया जाता है। अगर पर्वों की भी हायरार्की होती है, तो फिर बिहार के लोगों के लिए ‘छठ’ उसमें टॉप पर आता है। पर्वों का अपना समाजशास्त्र है, इसपर चर्चा कभी और...! कभी भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने लिखा था कि त्योहार ही हमारी म्युनिसिपालिटी हैं। ऐसा लगता है कि काशी में रहते हुए ज़रूर उनका परिचय इस ‘महापर्व’ से हुआ होगा। कितनी सत्यता है उनके इस एक वाक्य में- “त्योहार ही म्युनिसिपालिटी हैं हमारी“ इस एक वाक्य की सत्यता व स...